Home Education News भारतीय फिल्मों में अब जंगल,जानवर और पक्षी क्यों नहीं दिखते

भारतीय फिल्मों में अब जंगल,जानवर और पक्षी क्यों नहीं दिखते

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नई दिल्ली ब्योरों रिपोर्ट :- डिज्नी की फिल्म जंगलबुक ने भारत में प्रदर्शित किसी भी हॉलीवुड फिल्म के एक दिन में सबसे अधिक कमाई का रिकॉर्ड बनाया । कुछ ऐसा ही स्वागत साल 2012 में आयी जानवर और इंसान के रिश्तों पर बनी आंग ली निर्देशित फिल्म “लाइफ ऑफ पाई” का भी हुआ था इस फिल्म ने भी भारत में खासी कमाई की थी |

तथ्य यह है कि दोनों फ़िल्में भारत केन्द्रित इंसान और जानवर के रिश्तों पर बनी थी और दोनों ही हॉलीवुड के निर्माताओं की देन थी,पर जब हम दुनिया में सबसे ज्यादा फ़िल्में बनाने वाले देश की फिल्म इंडस्ट्री पर नजर डालते हैं तो हम पाते हैं हमारी फिल्मों से जंगल और जानवर लगातार गायब होते जा रहे हैं और उनकी जगह हमें दिख रही है मानव निर्मित कृत्रिमता,पर हमेशा से ऐसा नहीं था |

हिन्दी फिल्मों में जानवरों का इस्तेमाल उतना ही पुराना है, जितना इसका इतिहास। अगर आप हिन्दी सिनेमा की पहली फिल्म राजा हरीशचंद्र भी देखें, तो वहां भी दृश्यों में जानवर नजर आएंगे। यह स्थापित तथ्य है इंसान और जानवर अलग होकर वर्षों तक नहीं जी सकते और शायद इसीलिये हिन्दी फिल्मों में जानवर लंबे समय तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे|

फिल्मों में जानवरों की उपस्थिति 1930 और 40 के दशक में नाडिया की फिल्मों में देखी जा सकती है पर उसके बाद ये सिलसिला बहुत तेजी से आगे बढ़ा जिसमे रानी और जानी, धरम वीर, मर्द, खून भरी मांग, तेरी मेहरबानियां, दूध का कर्ज़, कुली और अजूबा, जैसी फ़िल्में शामिल हैं|

दो हजार के दशक में अक्षय कुमार अभिनीत “इंटरटेनमेंट” ही एक मात्र उल्लेखनीय फिल्म रही जिसमें इंसान के साथ साथ जानवर भी अहम् भूमिका में था,इसके अलावा सुंदर बन के बाघों पर बनी फिल्म “रोर” का भी उल्लेख किया जा सकता है |

हमें बिलकुल भी एहसास नहीं हुआ कि कब हमारे जीवन में प्रमुख स्थान रखने वाले जानवर सिल्वर स्क्रीन से कब गायब हो गए|आज फिल्मों में आधुनिकता के सारे नए प्रतीक दिखते हैं|मॉल्स से लेकर चमचमाती गाड़ियों तक ये उत्तर उदारीकरण के दौर का सिनेमा हैं|

समीक्षक हिन्दी सिनेमा से जानवरों के गायब हो जाने के पीछे कड़े होते जाते वन्य जीव कानून का हवाला देते हैं और मानते हैं कि निर्माता कानूनी पचड़ों में नहीं पड़ना चाहते इसलिए फिल्मों में जानवरों का कम इस्तेमाल होने लगा है|पर तर्क यह भी है कि हॉलीवुड तकनीक के सहारे नियमित अंतराल पर जानवर और इंसान के रिश्तों पर फिल्म बना सकता है तो भारतीय फिल्म उद्योग क्यों नहीं ?

इसका एक कारण उदारीकरण के पश्चात जीवन का अधिक पेचीदा हो जाना और मशीनों पर हमारी बढ़ती निर्भरता है| विकास की इस दौड़ में जैसे जैसे हमारी मशीनों पर निर्भरता बढी जानवरों से हमारा रिश्ता कम होता चला गया |

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि विकास प्रकृति और जानवरों की कीमत पर न हो |जंगल और जानवर तभी बचेंगे जब हम इनको लेकर जागरूक और जिम्मेदार बनेंगे और फ़िल्में इस जागरूकता को बढ़ाने का एक अच्छा माध्यम हो सकती हैं |असल जीवन में कटते पेड़ और गायब होते जानवरों के प्रति संवेदना को बढ़ाने का एक तरीका सिनेमा की दुनिया में उनका लगातार दिखना एक अच्छा उपाय हो सकता है|पशु पक्षी के फिल्मों में कम दिखने का क्या कारण है


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