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चुनाव के बीच विपछी पर छापे, क्या आयकर विभाग ने तोड़ी आचार संहिता?

लोकसभा चुनाव के मद्देनजर आदर्श आचार संहिता (MCC) लागू है, ऐसे में राजनीतिक दलों के खि‍लाफ इनकम टैक्स के रेड को लेकर चुनाव आयोग (ECI) और वित्त मंत्रालय के बीच बयानबाजी चल रही है. पिछले छह महीने में ही आयकर विभाग ने विपक्षी दलों के नेताओं या करीबियों पर करीब 15 छापे डाले हैं. रविवार को चुनाव आयोग ने राजस्व सचिव को लेटर लिखकर यह सख्त हिदायत दी कि उनके निरीक्षण में काम करने वाली प्रवर्तन एजेंसियों-इनकम टैक्स विभाग और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को राजनीतिक दलों के खि‍लाफ कार्रवाई में पूरी तरह तटस्थ, निष्पक्ष और भेदभाव रहित होना चाहिए.

असल में चुनाव के ऐन बीच में कांग्रेस नेता कमलनाथ के करीबियों के चार राज्यों में स्थित 52 ठिकानों पर इनकम टैक्स विभाग ने छापा डाला. दिल्ली की टीम अपने साथ सीआरपीएफ जवानों को लेकर गई थी और इस छापे के बारे में मध्य प्रदेश के मुख्य चुनाव आयुक्त को भी जानकारी नहीं दी गई. मंगलवार को इसके जवाब में राजस्व सचिव और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने चुनाव आयोग के आरोपों को खारिज करते हुए उल्टा यह सलाह दे दी कि चुनाव आयोग को कालेधन पर अंकुश लगाना चाहिए और इसके लिए कर अधिकारियों का सहयोग लेना चाहिए.

IT और ED के निशाने पर है विपक्ष!

10 मार्च को आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद से इनकम टैक्स विभाग (IT) और प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने तेलुगु देशम पार्टी (TDP), द्रविण मुन्नेत्र कणगम (DMK) और जनता दल सेुकलर (JD-S) को निशाना बनाते हुए कई छापे मारे. 5 अप्रैल को टीडीपी सांसद सीएम रमेश और उनके करीबियों के यहां इनकम टैक्स के छापे डाले गए जिसके बाद आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने आरोप लगाया कि एनडीए सरकार के इशारे पर केंद्रीय एजेंसियां उनके नेताओं को प्रताड़ित कर रही हैं. वे इसके खि‍लाफ अमरावती में धरने पर बैठ गए थे. इसके बाद 28 मार्च को दिल्ली के सीआरपीएफ जवानों के साथ ही इनकम टैक्स विभाग के अधि‍कारियों ने कर्नाटक की जेडीएस सरकार के मंत्री सीएस पुट्टाराजु, उनके रिश्तेदारों और करीबियों के ठिकानों पर छापे मारे. इसके बाद 29 मार्च को विपक्ष की एक और पार्टी डीएमके के खजांची दुरई मुरुगन के तमिलनाडु में वेल्लोर, कटपाडी और अन्य स्थानों पर छापे मारे गए.

निष्पक्ष चुनाव कराना सरकार की भी जिम्मेदारी

निष्पक्ष चुनाव कराना सिर्फ चुनाव आयोग की ही नहीं, बल्कि सरकार की भी जिम्मेदारी है. सरकार की यह जिम्मेदारी है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करे और सभी कैंडिडेट एवं राजनीतिक दलों को बराबरी का मौका दे.

साल 1979 में आदर्श आचार संहिता में एक नया अध्याय जोड़ा गया था, जिसमें यह कहा गया था कि, ‘केंद्र या राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी को भी यह शिकायत करने का मौका न मिले कि सरकार ने चुनाव अभि‍यान के लिए अपने आधि‍कारिक प्रभाव का दुरुपयोग किया है.

चुनाव आयोग के खर्च निगरानी प्रभाग (EMD) ने 16 जनवरी, 2013 को सीबीडीटी चेयरमैन को निर्देश जारी कर चुनाव अभि‍यान के दौरान इनकम टैक्स की भूमिका को साफ तौर पर परिभाषित किया था. इसमें कहा गया था- चुनाव प्रक्रिया के दौरान अवैध नकदी की आवाजाही पर अंकुश पर निगरानी रखनी होगी. इस जरूरत के लिए चुनाव आयोग कर अधिकारियों की सेवाएं ले सकता है और संबंधित राज्य के आयकर महानिदेश के तहत काम करने वाले अधिकारियों को तलब कर सकता है.

इसका मतलब यह है कि आयकर विभाग को चुनाव आयोग का रिपोर्ट करना ही होगा और उसकी भूमिका सिर्फ धनबल के दुरुपयोग को रोकने की होगी. चुनाव के दौरान रूटीन जांच प्रक्रिया को ठंडे बस्ते में रखा जाएगा ताकि चुनावों पर कोई असल न पड़े. और इस परंपरा का इसके पहले तक पालन भी होता रहा.

चुनाव आयोग द्वारा राजस्व सचिव को भेजे नोटिस पर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त कुरैशी ने आजतक-इंडिया टुडे से कहा-‘ जी नहीं, ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया. हमारे समय में तो सरकारी एजेंसियां इस बारे में विशेष सतर्क रहती थीं कि किसी भी पार्टी या कैंडिडेट को किसी भी तरह से नुकसान या उसके चुनाव पर असर न हो. सामान्य कामकाज तो टाल दिया जाता था.’

करीब 52 साल तक चुनाव आयोग के कानून विभाग में काम करने वाले एसके मेहंदीरत्ता ने भी कहा कि इस प्रकार का निर्देश पहले कभी जारी नहीं करना पड़ा. चुनाव आयोग के एक अधि‍कार ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहा, ‘विपक्षी दलों के नेताओं पर इस प्रकार के रेड सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग को बताता है और आचार संहिता के पार्ट VII उल्लंघन करता है.’

आदर्श आचार संहिता स्वैच्छिक है, लेकिन सब पालन करते रहे हैं

आदर्श आचार संहिता असल में राजनीतिक दलों द्वारा स्वैच्छिक तरीके से स्वीकार की गई परिपाटी है जिसे 1968-69 में चुनाव आयोग और तत्कालीन सरकार ने अपनाया था. हालांकि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के कई आदेशों से इसे समर्थन मिला है. इससे चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से चुनाव करने का नैतिक आधार मिलता है.